जब हम स्कूल जाते थे,
रास्ते में पड़ता था एक घर,
घर कहूँ या कहूँ उसे खँडहर,
दर दीवारें दरकी हुयी,
दरवाज़े थे टूटे हुए,
कहीं कहीं से दर्द छलकता हुआ,
मानो अपने आबाद दिनों को याद कर,
आज की बदहाली पर रो रहा है ..
अक्सर लोग कहते थे,
वहां कभी जाना नहीं,
साया वहां है अच्छा नहीं,
पर मासूम सा मेरा दिल,
एक खटके से कहता था,
आज मेरा घर आबाद है,
क्या कल को ये खँडहर था?
सोचते ही सिहर उठता हूँ ...
लेकिन दिल मानता नहीं है,
कदमें चलती जाती हैं,
रोज़ की तरह उन्ही राहों में,
वही मंजिल है रास्ते वही,
पर हर दिन वही खँडहर भी तो वहीँ है...
आजाद होकर आहें दिल को सुकून देती हैं,
वो खँडहर भी बस जाएगा,
आबाद हो जाएगा,
चहल पहल होगी वहां,
दिल को भी तभी सुकून आएगा...
Friday, January 30, 2009
Tuesday, January 6, 2009
जाने इसे क्या कहते हैं...
जाने इसे क्या कहते हैं..
उसके लिए रोया हूँ मैं, उसके लिए रोया हूँ,
जाने कितने दिनों तक तकलीफे सहा हूँ मैं,
आंसुओं के अनगिनत बूंदों से मिला हूँ.
आरजू दिल की नहीं जान पाया हूँ मैं,
जकड़ा हुआ आज भी उन ही चाँद लफ्जों में हूँ,
सोचता हूँ सोचता हूँ जाने क्या जाने क्यूँ,
तू ही तू है मेरे ज़हन में जाने क्यूँ जाने क्यूँ,
नहीं पूरी होती है जो आरजू सच वही तोह है तू..
अक्सर ही खोजता हूँ तुझको अपने ही अक्स में,
क्यूँ नहीं मिलती है तू मेरे इस ज़हन में,
जाने इसे क्या कहते हैं की दिल रोता है तेरे लिए,
आज भी याद करता है दर्द यह सहते हुए..
उसके लिए रोया हूँ मैं, उसके लिए रोया हूँ,
जाने कितने दिनों तक तकलीफे सहा हूँ मैं,
आंसुओं के अनगिनत बूंदों से मिला हूँ.
आरजू दिल की नहीं जान पाया हूँ मैं,
जकड़ा हुआ आज भी उन ही चाँद लफ्जों में हूँ,
सोचता हूँ सोचता हूँ जाने क्या जाने क्यूँ,
तू ही तू है मेरे ज़हन में जाने क्यूँ जाने क्यूँ,
नहीं पूरी होती है जो आरजू सच वही तोह है तू..
अक्सर ही खोजता हूँ तुझको अपने ही अक्स में,
क्यूँ नहीं मिलती है तू मेरे इस ज़हन में,
जाने इसे क्या कहते हैं की दिल रोता है तेरे लिए,
आज भी याद करता है दर्द यह सहते हुए..
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