आज भी असर नहीं है मुझ पर तेरे दर्द का,
वर्ना बता मैँ कैसे हूँ ज़िँदा इस जहान में..
मैं हूँ अब तलक बेसुध और बेज़ुबान किसलिए,
वर्ना बता मैं रोया क्यों नहीं तेरी जुदाई में..
खामोश हैं मेरे जज़्बात और आँखें सुनी हैं,
जाने कब से इस मूर्दा जिस्म को ले ज़िँदा हूँ..
मर के भी मरती नहीं हैं यादें तेरी मेरे ज़ेहन से,
क्या यही है सबूत मेरे ज़िँदा होने का..