Friday, March 6, 2009

ज़िँदा हूँ मैं..

आज भी असर नहीं है मुझ पर तेरे दर्द का,
वर्ना बता मैँ कैसे हूँ ज़िँदा इस जहान में..
मैं हूँ अब तलक बेसुध और बेज़ुबान किसलिए,
वर्ना बता मैं रोया क्यों नहीं तेरी जुदाई में..
खामोश हैं मेरे जज़्बात और आँखें सुनी हैं,
जाने कब से इस मूर्दा जिस्म को ले ज़िँदा हूँ..
मर के भी मरती नहीं हैं यादें तेरी मेरे ज़ेहन से,
क्या यही है सबूत मेरे ज़िँदा होने का..

डर लगता है

दुआएं न दिया करो, अब इन दुआओं से डर लगता है।
वहम के अक्स दिल में हैं, हवाओं से डर लगता है।
वफा की उम्मीद नहीं है अब, कस्मोँ से डर लगता है।
ज़ख्म दिल में हैं मेरे, दवाओं से डर लगता है।

सुबह प्यारी नहीं लगती, रातों से डर लगता है।
हँसी चुभती है सच, अश्कोँ से डर लगता है।
आँखें सुनी है अब तो, नज़ारोँ से डर लगता है।
ये राहेँ किसके लिए हैं, इन राहोँ से डर लगता है।