Monday, February 23, 2009

ज़िँदगी

सिसकती हुई ज़िँदगी आई मेरे पास बोली कैसे हो मैंने कहा ठीक हूँ वो बोली क्यों ठीक हो अच्छे क्यों नहीं मैं स्तब्ध रह गया वो बोली मैं सिसक सिसक कर जीना नहीं चाहती मैं बोला तो बताओ मैं क्या करूँ वो बोली खुल कर एक बार जी ले चाहे अगले ही पल मौत आ जाए एक पल बस एक पल आजाद हो जा

अँधेरा और उम्मीद का साया..

है जहाँ उजाले वहाँ कभी अँधेरे भी हुआ करते थे
जो कहता है मुझे नहीं पसंद अँधेरा झूठ बोलता है
हर अक्स में तुझे खोजता हूँ क्योंकि मेरा ही साया तू है
जाने कब मैं खो गया तुझमें और तू मेरा हो गया
दिए जलाते आ रहे हैं वो मेरी जिंदगी में न जाने क्यों
मैं तो उन्हें ही अपना आफताब माने बैठा हूँ
वो किसके साये हैं जो मेरे ख्वाबगाह में छाए हैं
मुझे ही जिसकी कदर है और तड़प है जिसकी
हैं जहाँ उजाले वहाँ अँधेरे भी हुआ करते थे
आसमाँ में जुगनु जितने हैं उतने ही दिए मेरे आँगन में हैं
रात नहीं है काली उतनी जितना मेरा साया है
आँखों में मोती नहीं हैं ये उनकी दुआओं की गंगा है
अक्सर सवेरा होने से पहले अँधेरा गहरा जाता है
मेरे खुदा मेरे अक्स को ले जा कि वो आने को है
उसकी ही ये आहट है और रात भी जाने को है..