Friday, January 30, 2009

वो दरवाज़ा आज तलक खुला नहीं...

जब हम स्कूल जाते थे,
रास्ते में पड़ता था एक घर,
घर कहूँ या कहूँ उसे खँडहर,
दर दीवारें दरकी हुयी,
दरवाज़े थे टूटे हुए,
कहीं कहीं से दर्द छलकता हुआ,
मानो अपने आबाद दिनों को याद कर,
आज की बदहाली पर रो रहा है ..
अक्सर लोग कहते थे,
वहां कभी जाना नहीं,
साया वहां है अच्छा नहीं,
पर मासूम सा मेरा दिल,
एक खटके से कहता था,
आज मेरा घर आबाद है,
क्या कल को ये खँडहर था?
सोचते ही सिहर उठता हूँ ...
लेकिन दिल मानता नहीं है,
कदमें चलती जाती हैं,
रोज़ की तरह उन्ही राहों में,
वही मंजिल है रास्ते वही,
पर हर दिन वही खँडहर भी तो वहीँ है...
आजाद होकर आहें दिल को सुकून देती हैं,
वो खँडहर भी बस जाएगा,
आबाद हो जाएगा,
चहल पहल होगी वहां,
दिल को भी तभी सुकून आएगा...

4 comments:

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर…आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

Yugal said...

शुभकामनाएं

Unknown said...

चहल पहल होगी वहां,
इसी आशा के साथ मेरी शुभकामनाएं ग्रहण करें।
श्याम बाबू शर्मा
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Harsh Prakash Zamorya said...
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