आज कौन सी तस्वीर पर मैं हूँ,
आज कौन सी निगाहों में मैं हूँ,
मेला खत्म हो गया जाने कब से,
जाने कौन से ख़यालोँ मेँ मैं हूँ..
आँखें हैं इंतज़ार में किसकी,
क्यों हर आते जाते को पूछता मैं हूँ,
आवाज़ ख़ामोश है पर मेरा दिल नहीं,
धड़कन किसकी लगातार सुनता मैं हूँ..
गली मेरी सुनी नहीं है लेकिन,
इन लोगों से अनजान हूँ मैं,
तरस गया हूँ बात करने के लिए,
क्योंकि इन्हीं लफ्ज़ोँ से अनजान हूँ मैं..
दुआएं काफी दे रखी हैं सबको,
खुद ही अब मेहर का तलबगार हूँ मैँ,
झुकनी है नज़रें तेरे ही दर पे,
और तेरे ही इनायत से अनजान मैं हूँ..
हर दिल में तेरा ही तो ठिकाना है,
और मैं नादान हर कदम बेघर हूँ,
तेरी ही ईबादत करता रहूँगा अगर,
मोहब्बत और खुदा के दर पे मैं हूँ..
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हर दिल में तेरा ही तो ठिकाना है,
और मैं नादान हर कदम बेघर हूँ,
तेरी ही ईबादत करता रहूँगा अगर,
मोहब्बत और खुदा के दर पे मैं हूँ..
dil karib lagi yah panktiyan..............
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